आचार्य श्री सुनील सागरजी जी गुरुदेव ने प्रवचन में कहा “क्यों गुरुर करते हो बाहर के ठाठ पर”, आर्यिका 105 श्री संपूर्णमति माताजी का केशलोंच संपन्न*

धर्म

*आचार्य श्री सुनील सागरजी जी गुरुदेव ने प्रवचन में कहा “क्यों गुरुर करते हो बाहर के ठाठ पर”, आर्यिका 105 श्री संपूर्णमति माताजी का केशलोंच संपन्न*

नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।
प्रातःकाल की मंगल बेला में आचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव की परम शिष्या आर्यिका 105 श्री संपूर्णमति माताजी का केशलोंच संपन्न हुआ। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने संयम, त्याग और आत्मसाधना के इस कठोर साधना के प्रत्यक्ष दर्शन कर धर्मलाभ लिया।

 

जैन दर्शन में केशलोंच मुनि–आर्यिकाओं की संयम साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इसमें मुनि–आर्यिकाएं अपने हाथों से सिर के बालों का त्याग करते हैं। यह केवल बाहरी रूप से बालों का त्याग नहीं, बल्कि देह के प्रति ममत्व, सौंदर्य के आकर्षण और सुख-सुविधाओं के मोह को छोड़ने की साधना का प्रतीक है। केशलोंच साधक को निरंतर यह स्मरण कराता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा ही वास्तविक स्वरूप है। सहनशीलता, वैराग्य, अपरिग्रह और आत्मकल्याण की भावना को दृढ़ करने वाली यह साधना जैन मुनि-आर्यिका जीवन की कठिन तपश्चर्या का परिचायक है।

 

 


इस अवसर पर आचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव ने बाहरी वैभव और अहंकार पर चिंतन कराते हुए कहा कि मनुष्य बाहरी वस्तुओं को लेकर अत्यधिक गुरुर करता है—“हमारी दुकान इतनी बड़ी है, हमारा घर इतना बड़ा है, हमारी पहचान इतनी बड़ी है…” लेकिन इन बाहरी उपलब्धियों का वास्तविक मूल्य क्या है, यह जीवन की अंतिम यात्रा के समय समझ में आता है। उन्होंने कहा कि बाहरी चीजों के प्रति इतना अधिक गुरुर हो जाता है कि मनुष्य कभी-कभी अपने गुरु और धर्म को भी भूल जाता है।

 

गुरुदेव ने कहा कि ज्ञानी के लिए गुरुर पतन और दुर्गति का कारण बन सकता है, जबकि गुरु का आश्रय जीवन को सुगति की ओर ले जाने वाला होता है। मनुष्य को अपने बाहरी वैभव पर नहीं, बल्कि अपने भीतर के गुणों, संयम और आत्मिक उन्नति पर ध्यान देना चाहिए।
गुरुदेव ने जीवन की वास्तविकता बताते हुए कहा कि हम मिट्टी से आए हैं और अंततः इसी मिट्टी में समा जाना है। जब अंतिम सत्य यही है, तो फिर किस बात का गुरुर? इसी भाव को पंक्तियों में अभिव्यक्त करते हुए कहा गया—“क्यों गुरुर करते हो बाहर के ठाठ पर, मुट्ठी भी खाली होगी जब पहुँचोगे आखिरी घाट पर।” यह संदेश उपस्थित श्रावकों को बाहरी आडंबर और अहंकार से दूर रहकर आत्मचिंतन, विनय और गुरु-धर्म के प्रति समर्पण का मार्ग दिखा गया।

माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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