अपनी आत्मा के पास बसना ही तप है : आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज

धर्म

अपनी आत्मा के पास बसना ही तप है : आचार्य श्री आर्जव सागर महाराज

दसलक्षण पर्व के सप्तम दिन अजितनाथ सभागार में गूंजा तप धर्म का संदेश, इच्छाओं के निरोध और आत्मशुद्धि का दिया मार्गदर्शन

बड़ौत।

दसलक्षण पर्युषण महापर्व के सप्तम दिन अजितनाथ सभागार में धर्म और आध्यात्मिकता का वातावरण देखने को मिला। आचार्य गुरुदेव श्री 108 आर्जव सागर महाराज ने उत्तम तप धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि अपनी आत्मा के पास बसना ही तप है। तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इच्छाओं का निरोध कर आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त करने की साधना है।

आचार्य श्री ने कहा कि जिस प्रकार स्वर्ण-पाषाण को अग्नि में तपाने से उसकी किट्ट और कालिमा दूर होकर शुद्ध स्वर्ण प्रकट होता है, उसी प्रकार आत्मा पर जमे कर्मों की किट्ट-कालिमा तप के माध्यम से दूर की जा सकती है। कर्मों की यह कालिमा ही आत्मा को संसार में बांधे हुए है। जब कर्मों की निर्जरा होगी, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ेगी।

उन्होंने कहा कि अपनी इच्छाओं का निरोध करना भी तप है। इच्छाओं की लगातार पूर्ति करते रहना तप नहीं है, बल्कि अपनी आवश्यकताओं और लिए गए नियमों का पूर्ण पालन करना ही वास्तविक तप है। दसलक्षण महापर्व में श्रद्धालु उपवास, एकासन, जल अथवा रस-त्याग, हरी सब्जियों और फलों आदि के त्याग के माध्यम से बाह्य तप कर रहे हैं। इन साधनाओं का उद्देश्य शरीर को तपाने के साथ-साथ आत्मा को भीतर से निर्मल बनाना है।

आत्मा और शरीर का भेद समझना जरूरी

आचार्य श्री ने आत्मशुद्धि को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार दूध से घी प्राप्त करने के लिए दही जमाया जाता है और फिर मंथन किया जाता है, उसी प्रकार आत्मा में भेद-विज्ञान रूपी जामन डालकर निश्चय और व्यवहार रूपी मंथन से आत्मा और शरीर के वास्तविक भेद को समझना आवश्यक है। इसी साधना के माध्यम से आत्मा अरहंत अवस्था की ओर बढ़ती है और अंततः सिद्ध पद को प्राप्त करती है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक बार दूध से घी बनने के बाद वह पुनः दूध नहीं बनता, उसी प्रकार सिद्ध भगवान संसार में दोबारा लौटकर नहीं आते। यह अवस्था आत्मा की परम शुद्धता और मुक्ति का प्रतीक है।

12 प्रकार के तपों की साधना का संदेश

आचार्य श्री ने कहा कि मुनिराज सदैव ध्यान, स्वाध्याय और तप में लीन रहते हुए बारह प्रकार के तपों की साधना करते हैं। श्रावकों को भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत, नियम, संयम, एकासन, उपवास और स्वाध्याय के माध्यम से तप की आराधना करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पर्व के दिनों में यथाशक्ति भोजन का त्याग करना, स्वाध्याय करना, रात्रि में जल का त्याग करना और रात्रि भोजन से विरत रहना भी तप की साधना है। जो श्रावक इन नियमों को धारण करता है, वह तप धर्म की आराधना करता है।

आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि तप को केवल बाहरी साधना तक सीमित न रखें, बल्कि ध्यान रूपी तप के माध्यम से अपने अंतरंग को शुद्ध करें। कर्मों से दूर रहने की भावना, इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना ही तप धर्म की वास्तविक साधना है। यही साधना आत्मा को उसकी मंजिल तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *