*तलाश बाहर की थी, खजाना भीतर था– आचार्य श्री सुनीलसागरजी*
नेमी नगर जैन कॉलोनी,इंदौर।
गुरुदेव ने कहा दक्षिण अफ्रीका की एक प्रेरक कहानी, जो इंसान को खुद से मिलने का संदेश देती है। कहा जाता है कि दूरियाँ केवल किलोमीटर में नहीं नापी जातीं…कभी-कभी खुद से मिलने में भी पूरी उम्र गुजर जाती है।
दक्षिण अफ्रीका में एक किसान बेहद गरीब था। उसकी जमीन बंजर थी और खेत में कुछ खास पैदा नहीं होता था। एक दिन उसने अखबार में पढ़ा कि देश के एक क्षेत्र में हीरों की खदान मिली है। उसके मन में विचार आया कि यदि वहां हीरे मिल सकते हैं, तो वह भी अपनी किस्मत आजमा सकता है।
उसने अपना खेत बेचने का फैसला किया। बहुत कम कीमत में खेत बेचकर जो पैसा मिला, उससे वह उस क्षेत्र तक पहुंच गया। वहां उसने लंबे समय तक मेहनत की, जमीन खोदी, लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं लगा।निराश होकर वह वापस अपने गांव लौट आया।
लेकिन गांव के पास पहुंचते ही उसे पता चला कि जिस खेत को उसने मामूली कीमत में बेच दिया था, उसी जमीन से हीरे निकल रहे हैं। जिस व्यक्ति ने वह जमीन खरीदी थी, वह देखते ही देखते अरबपति बन चुका था।
यह सुनकर किसान को ऐसा सदमा लगा कि वह जमीन पर गिर पड़ा।यह कहानी केवल हीरों की नहीं है…यह हमारी जिंदगी की भी कहानी है।
हम भी अपने भीतर मौजूद अनमोल खजाने को छोड़कर उसे बाहर तलाशते रहते हैं। सुख की तलाश में इधर-उधर भटकते हैं, सफलता की तलाश में जगह-जगह जाते हैं और शांति के लिए संसार के दरवाजे खटखटाते हैं। जबकि जिस खजाने की हमें तलाश है, वह हमारे भीतर ही मौजूद है।
जिनवाणी हमें बार-बार बताती है—“तुम्हारे भीतर ही अनंत सामर्थ्य और अनमोल खजाना है।” गुरुदेव समझाते हैं कि जिसे पाने के लिए हम संसार में भटक रहे हैं, उसकी शुरुआत अपने भीतर झांकने से होती है। लेकिन सवाल यह है—जब तक हमें यह समझ आता है, तब तक हम जिंदगी की कितनी दूरियां तय कर चुके होते हैं?
खुकहींद ऐसा न हो कि अपने ही खेत के नीचे छिपे हीरों को छोड़कर हम पूरी जिंदगी दूसरे खेतों में खजाना तलाशते रहें। क्योंकि असली दूरी किलोमीटर की नहीं खुदसे खुद तक पहुंचने की है। और इस यात्रा में जितना जल्दी हम भीतर झांकना शुरू कर दें, उतना ही बड़ा हमारा सौभाग्य है।
माही जैन धीरावत पीपलखूंट प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





