पगडंडियां अनेक, मंजिल एक—गति से ज्यादा जरूरी है सही दिशा : मुनि सुधासागर जी महाराज
‘मैं अच्छा हूं, जगत बुरा है’ की सोच सबसे खतरनाक; गुरु बताते हैं मोक्ष की दिशा, चलना स्वयं को ही पड़ेगा
इंदौर।
दलाल बाग, छत्रपति नगर में चल रहे धार्मिक आयोजन के दौरान देशना मंडप में निर्यापक श्रमण पूज्य मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने जीवन की दिशा और आत्मसुधार का गहरा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संसार में पगडंडियां अनेक हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। पगडंडी कोई भी बना सकता है, मगर सही दिशा गुरु और भगवान ही बताते हैं।
मुनिश्री ने जीवन की यात्रा को समझाते हुए कहा कि हमारा ‘कैंप’ मोक्ष है और संसार एक घना जंगल। जिस प्रकार एनसीसी के नाइट मार्च में दिशा-सूचक आगे बढ़ने की सही दिशा बताता है, उसी प्रकार जीवन के अंधकार में गुरु मोक्ष की दिशा दिखाते हैं। लेकिन दिशा दिखाने का काम गुरु कर सकते हैं, उस मार्ग पर चलना स्वयं को ही पड़ेगा।
‘मैं अच्छा हूं, जगत बुरा है’—सबसे खतरनाक सोच
मुनि सुधासागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति के जीवन की सबसे खतरनाक पगडंडी यह सोच है कि ‘मैं अच्छा हूं और जगत बुरा है।’ जब इंसान अपने दोषों को देखना बंद कर देता है और अपनी हर गलती का जिम्मेदार दूसरे को मानने लगता है, तब उसके सुधार का रास्ता बंद हो जाता है।
उन्होंने दूसरी खतरनाक प्रवृत्ति बताते हुए कहा—‘मैं जैसा हूं, वैसा ही दुनिया को बना दूं।’ समाज को आत्मचिंतन का संदेश देते हुए उन्होंने संकल्प दिलाया कि मैं स्वयं गिरूं तो भी किसी को नहीं गिराऊंगा और अपने दोषों को अगली पीढ़ी की विरासत नहीं बनाऊंगा।
मुनिश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति रात्रि भोजन जैसी अपनी कमजोरी को स्वयं नहीं छोड़ पा रहा है, तो कम से कम उसे अपनी अगली पीढ़ी के लिए आदर्श न बनाएं। बच्चों से इतना जरूर कहें—‘मैं इसे छोड़ नहीं पा रहा हूं, लेकिन तुम इसे मत अपनाना।’ यही आत्मस्वीकृति और अगली पीढ़ी को सही संस्कार देने की शुरुआत है।
गंधोदक नहीं, परिवार को दें धर्म और संस्कार
मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अभिषेक और गंधोदक की महत्ता को समझाते हुए कहा कि गंधोदक की कीमत नहीं, उस हाथ की कीमत पहचानिए जो अभिषेक कर परिवार को गंधोदक देता है।
उन्होंने कहा कि वह केवल जल नहीं है, बल्कि धर्म और संस्कार का संदेश है। अभिषेक करते समय मन में यह संकल्प होना चाहिए कि यह कार्य मेरे बेटे-बेटी और पूरे परिवार के कल्याण के लिए है।
उन्होंने विशेष रूप से बेटियों के संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि बेटी को संपत्ति देने से पहले धर्म और संस्कार दें, क्योंकि संपत्ति समाप्त हो सकती है, लेकिन अच्छे संस्कार पीढ़ियों तक चलते हैं।
मुनिश्री के संदेश ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, सही दिशा में आगे बढ़ने और आने वाली पीढ़ी को बेहतर संस्कार देने की प्रेरणा दी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312





