सहधर्मी के सुख में प्रसन्नता, दुःख में सहभागिता ही सच्चा वात्सल्य : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
नसियां जी में ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के वात्सल्य अंग का भावपूर्ण विवेचन | निष्कपट प्रेम, सहयोग और आत्मीयता को बताया सच्चे धर्म की पहचान
कोटा, 12 अगस्त।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में चल रही चातुर्मास प्रवचनमाला में धर्म और अध्यात्म की ज्ञानधारा निरंतर प्रवाहित हो रही है।
इसी क्रम में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ में वर्णित वात्सल्य अंग का अत्यंत भावपूर्ण, मार्मिक एवं व्यावहारिक विवेचन किया। उन्होंने कहा कि सहधर्मी के प्रति निष्कपट प्रेम, सम्मान और सहयोग ही वात्सल्य है तथा यही सच्चे धर्म की पहचान है।
वात्सल्य केवल प्रेम नहीं, निष्कपट आत्मीयता है
मुनि श्री ने कहा कि वात्सल्य का अर्थ सहधर्मियों के प्रति छल-कपट से रहित सद्भावना, प्रेम, आत्मीयता तथा यथायोग्य विनय और भक्ति का भाव रखना है। धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि जब हम किसी साधर्मी के सुख-दुःख में उसके साथ खड़े होते हैं, उसकी सफलता में प्रसन्न होते हैं, कठिन समय में उसका सहारा बनते हैं और बिना किसी स्वार्थ के उसके प्रति आत्मीयता रखते हैं, तभी जीवन में वात्सल्य का वास्तविक प्राकट्य होता है।
गुणों को देखें, मतभेदों को नहीं
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि समाज में कई बार छोटी-छोटी बातों से मनमुटाव, अहंकार और दूरियां उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे समय में वात्सल्य हमें सिखाता है कि व्यक्ति के दोषों के बजाय उसके गुणों को देखें और मतभेदों को बढ़ाने के बजाय प्रेम व संवाद के माध्यम से दूर करें।
उन्होंने कहा कि सहधर्मी के प्रति ईर्ष्या नहीं, बल्कि उसके गुणों को देखकर प्रसन्न होना ही धर्म की वास्तविक सुंदरता है।
जिस समाज में परस्पर प्रेम, सम्मान, सहयोग और वात्सल्य की भावना होती है, वह समाज संगठित होकर धर्मप्रभावना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार में वात्सल्य हो तो परिवार सुखमय बनता है और समाज में वात्सल्य हो तो पूरा समाज एक परिवार की तरह दिखाई देता है।
स्वार्थरहित प्रेम ही वात्सल्य की सच्ची पहचान
मुनि श्री ने कहा कि वात्सल्य का सबसे सुंदर रूप यह है कि हम किसी से इसलिए प्रेम न करें कि वह हमारे लिए कुछ करता है, बल्कि इसलिए करें कि वह भी हमारी तरह धर्ममार्ग का पथिक है। प्रेम में स्वार्थ नहीं, अपनत्व होना चाहिए और व्यवहार में दिखावा नहीं, बल्कि निष्कपटता होनी चाहिए।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि हम अपने सहधर्मियों के प्रति प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित कर लें, तो अनेक विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। आज आवश्यकता है कि निंदा के स्थान पर गुणानुवाद, विरोध के स्थान पर सहयोग और दूरी के स्थान पर आत्मीयता को अपनाया जाए।
वात्सल्य पर भावपूर्ण संदेश
«जहाँ प्रेम में स्वार्थ नहीं, जहाँ हृदय में मान नहीं,
साधर्मी के सुख में सुख हो, दुःख में जिसका साथ सही।
वही वात्सल्य धर्म है, वही धर्म की सच्ची शान,
प्रेम, करुणा और आत्मीयता—यही श्रावक की पहचान।»
धर्मसभा में बाहर से आए श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत
धर्मसभा में बाहर से पधारे श्रद्धालुओं ने परम पूज्य मुनि श्री योगसागर जी महाराज के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पश्चात चातुर्मास स्वागत समिति द्वारा अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।
चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। संपूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, गुरुभक्ति और जिनवाणी के मंगलमय स्वरों से गुंजायमान रहा।
इन परिवारों ने अर्जित किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री भुमेन्द्र जी, श्रीमती शकुन्तला जी, श्री नामोकर जी एवं जैन परिवार, तलवंडी, कोटा; श्री हुकमचंद सोगानी परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
श्री हुकम जी, एडवोकेट ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री भुमेन्द्र जी, श्रीमती शकुन्तला जी, श्रीमती अल्का जी, श्री नामोकर जी एवं समस्त जैन परिवार, तलवंडी, कोटा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि क्षुल्लक श्री संयमसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री विमल जी, श्री योगेश जी, श्रीमती सोना जी एवं श्री प्रशम सेठिया, हरिगढ़ वाले परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती हर्षा कोटिया द्वारा सम्पन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🌼 गुरुवाणी का अमृत संदेश 🌼
“सहधर्मी के प्रति निष्कपट प्रेम, सम्मान और सहयोग ही वात्सल्य है; और वात्सल्य से ही धर्म समाज में जीवंत एवं प्रभावशाली बनता है।”
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312



