मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने: सच्ची भक्ति का रहस्य बताया, बोले- श्रद्धा, सेवा, पूजा, सत्संग और समर्पण से होता है आत्मकल्याण
गिरीडीह (मधुबन)।
राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि मनुष्य का जीवन उसके भावों से संचालित होता है। अच्छे और बुरे भाव ही उसके जीवन की दिशा तय करते हैं। यदि जीवन को सुखी, सफल और श्रेष्ठ बनाना है तो सबसे पहले अपने भावों को शुद्ध करना आवश्यक है। शुद्ध भाव ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करते हैं और वही उसे भवसागर से पार लगाने का माध्यम भी बनते हैं।
प्रातःकालीन धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अहंभाव, अहोभाव, भक्तिभाव और क्षमाभाव का विशेष महत्व है। हृदय में जितना अधिक भक्तिभाव जागृत होगा, उतना ही अहंकार समाप्त होगा और आत्मिक आनंद, प्रसन्नता एवं विनम्रता का विकास होगा।
उन्होंने कहा कि भगवान, गुरु और माता-पिता के गुणों के प्रति गहरी श्रद्धा ही सच्ची भक्ति का आधार है। केवल मंदिर जाना, पूजा करना या स्तुति पढ़ना ही भक्ति नहीं है। वास्तविक भक्ति तब है, जब साधक भगवान के समक्ष पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ स्वयं को उनके चरणों में अर्पित कर देता है।
मुनि श्री ने कहा कि भगवान का नाम केवल उच्चारण भर नहीं है। जब नाम के साथ श्रद्धा, विश्वास और समर्पण जुड़ जाता है, तब वही नाम कर्म निर्जरा का प्रभावी साधन बन जाता है। भक्ति बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतर्मन की पवित्रता और भावों की शुद्धता है।
उन्होंने बताया कि भक्ति के चार प्रमुख आधार—श्रद्धा, सेवा, समर्पण और पूजा हैं। श्रद्धा भक्ति की नींव है, पूजा उसे दृढ़ बनाती है, सेवा विनम्रता का विकास करती है और समर्पण आत्मा को भगवान के निकट ले जाता है। नियमित अभिषेक, पूजन और आराधना से भगवान के साथ आत्मिक संवाद स्थापित होता है।
आधुनिक उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैसे मोबाइल को प्रतिदिन चार्ज करना पड़ता है, वैसे ही श्रद्धा और भक्ति को भी प्रतिदिन पूजा एवं आराधना से ऊर्जा मिलती है। यदि पूजा में नियमितता नहीं होगी तो जीवन में प्रमाद और शिथिलता बढ़ने लगेगी।
उन्होंने कहा कि भगवान, गुरु और धर्म की सेवा भक्ति को और अधिक सशक्त बनाती है। सेवा और पूजा एक-दूसरे की पूरक हैं तथा इनके माध्यम से भक्तिभाव निरंतर विकसित होता है।
मुनि श्री ने भक्तिभाव को बनाए रखने के लिए सत्संग को सबसे प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि संतों का सान्निध्य श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण करता है और जीवन को नई दिशा देता है। यदि प्रतिदिन प्रत्यक्ष सत्संग संभव न हो तो घर बैठे संतों के संपूर्ण प्रवचन सुनने चाहिए। केवल छोटी-छोटी सोशल मीडिया रीलें देखने से आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता।
उन्होंने भक्तिभाव की निरंतरता के लिए तीन महत्वपूर्ण सूत्र—नियमित सत्संग, दृढ़ संकल्प और स्वाध्याय बताए। उनका कहना था कि जो व्यक्ति प्रतिदिन पूजा, अभिषेक, पाठ और आराधना करता है, उसके जीवन में आलस्य और प्रमाद स्थान नहीं बना पाते।
धर्मसभा के अंत में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि श्रद्धा, सेवा, समर्पण, पूजा, सत्संग और स्वाध्याय से युक्त जीवन ही वास्तविक भक्तिमय जीवन है। जब मनुष्य इन छह सूत्रों को अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है, तब उसके भाव शुद्ध होते हैं, कर्मों की निर्जरा होती है और आत्मकल्याण का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।
स्रोत: अविनाश जैन (विद्यावाणी)

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312
