जिसका पुण्य प्रबल, उसे सबकुछ प्राप्त, पुण्य क्षीण होने पर वस्तुएं भी चली जाएंगी: मुनिश्री योगसागर महाराज
बूंदी
परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री श्री108 योगसागरजी महाराज ससंघ का प्रवास इन दिनों देवपुरा में चल रहा है। रोजाना सुबह अभिषेक, शांतिधारा की जा रही है। आचार्यश्री का पूजन देवेंद्रकुमार जैन सामरिया और प्रियंका जैन सामरिया की मधुर लहरियों के बीच हुई। दीप प्रज्ज्वलन और शास्त्र भेंट के साथ धर्मसभा की गई।
धर्मसभा में पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108योगसागर महाराज ने कहा कि संसार में जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह व्यक्ति के पाप और पुण्य का परिणाम है, जिसका पुण्य प्रबल होता है, उसे सब कुछ प्राप्त होता है और पुण्य क्षीण होने पर प्राप्त वस्तुएं भी चली जाती हैं। व्यक्ति ने पूर्व में जो कर्म किए हैं, वर्तमान में वही उसे फलस्वरूप प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि भारत ही ऐसा देश है जहां संयमी महापुरुषों का जन्म होता है। अन्य देशों में धन और सुख-सुविधाएं भले ही अधिक हों, लेकिन धर्म का वास्तविक स्वरूपनहीं मिलता। हर जीव में भगवान बनने की क्षमता है, लेकिन मोह के कारण वह संसार में भटकता रहता है। कोई धन के मोह में बंधा है तो कोई परिवार और सुख-सुविधाओं के आकर्षण में।
धर्म में क्रिया नहीं, भावना का महत्व सबसे अधिक
मुनि योगसागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति का वर्तमान जीवन उसके पूर्व जन्मों के पाप और पुण्य का परिणाम है। पुण्य के प्रभाव से सुख, समृद्धि और धर्म की प्राप्ति होती है, जबकि मोह और स्वार्थ जीव को संसार में भटकाते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि हर जीव में भगवान बनने की क्षमता है, लेकिन धन, परिवार और सुख-सुविधाओं के मोह के कारण वह मोक्ष मार्ग से दूर हो जाता है। धर्म का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब उसे निष्काम भाव से किया जाए। मुनिश्री ने कहा कि भक्ति और पूजन में क्रिया से अधिक भावना का महत्व है। शुद्ध भावों से किया गया धर्म ही आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

मोह का त्याग किए बिना मोक्ष नहीं मिलेगा
मुनिश्री ने कहा कि मोह का त्याग किए बिना मोक्ष संभव नहीं है। यदि पुण्यानुबंधी पुण्य है तो व्यक्ति धर्म को आत्मकल्याण के लिए करता है, जबकि पापानुबंधी पुण्य में स्वार्थ और प्रदर्शन की भावना रहती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दो व्यक्ति मंदिर में पूजन-भक्ति कर रहे हैं। एक यश प्राप्ति की कामना से और दूसरा प्रभु जैसा बनने की भावना से। दोनों की क्रिया समान है, लेकिन भाव अलग-अलग हैं। भावों की शुद्धता ही भविष्य को शुद्ध बनाती है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
