“जब हम धर्म के रास्ते पर चल पड़ते है, तो पाप का रास्ता अपने आप बंद हो जाता है”- मुनि श्री प्रमाण सागर
भोपाल( अवधपुरी)
“जंहा राग है वही द्वैष है” किसी ने आपसे कुछ कहा और आपका मन तुरंत उसकी प्रतिक्रिया देने के लिये आतुर हो उठा,यही से कर्मबंध की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने प्रातःप्रवचन सभा में व्यक्त किये,उन्होंने कर्मबंध के कारण तथा ओर उसके निवारण का उपाय बताते हुये कहा “भावनायोग का विज्ञान” बहुत विस्तृत है।
इसे आपने साधना का अंग बना लिया तो यह आपके रागद्वेष और मोह को कम करेगा तथा कर्म निर्जरा का कारण भी बनेगा उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा मान लीजिये किसी ने आपसे कुछ अपशब्द कहे और आपने तुरंत उसका जबाब दे दिया तो वह कर्मबंध को प्राप्त करेगा और यदि आपके भावों में परिवर्तन आ गया और उसी समय आपका विवेक जाग्रत हो गया तो वह आपसे कहेगा “मुझे शांत रहना है” “मुझे शांत रहना है” तो उस समय क्रोध के जो संस्कार बन रहे थे उस पर तुरंत ब्रेक लग जाएगा।
मुनि श्री ने कहा “भावनायोग” यही कहता है कि अपने विकारों का शमन करो और अपने स्वभाव को जाग्रत करो” जब आप क्रोध के भाव को क्षमा के भाव से मिटाना शुरू कर दोगे तो एक नया पथवे बन जाएगा जब भी कोई क्रोध का कारण उपस्थित होगा तो अंदर से आपका अवचेतन मन आपको सावधान कर देगा “मुझे शांत रहना है” मुनि श्री ने कहा कि हम जैसी भाव धारा बनाते है,हमारी चेतना की मनोदशा वैसी ही हो जाती है,तथा जो कर्म बंध को प्राप्त होते है वह तुरंत संवर और निर्जरा को प्राप्त हो जाते है।


संवर का अर्थ है कर्मों का आना और निर्जरा का अर्थ है कर्मों का झड़ना जैसे हम नयी पगडण्डी पर चलना शुरु कर देते है,तो पुरानी पगडंडी पर झाड़फानूस आ जाने से वह अपने आप बंद हो जाती है,उसी प्रकार जब हम धर्म और साधना के रास्ते पर चलना प्रारंभ कर देंगे,तो पाप की पगडंडियाँ अपने आप बंद हो जायेंगी लेकिन अभी तो आप पाप के रास्ते के अभ्यासी हो उस वृति को मोड़ो और अपने आपको अशुभ से शुभ में ले आने का नाम ही धर्म है और यही चरित्र हमारे मोक्ष का आधार है, “भावनायोग” कर्म सिद्धांत के बहुत निकट है उन्होंने गहराई और चिंतन की बात करते हुये कहा कि हमारे कर्मो के साथ नौ कर्म का गहरा संबंध है, जितने उत्तम भाव होते है, वह नौ कर्म के परमाणुओं के माध्यम से ही होते है जिससे हमारे शरीर का स्वास्थ्य सुधरता है, उन्होंने कहा कि शारीरिक ,मानसिक,और भावनात्मक स्वास्थ को ठीक करने में नौ कर्म परमाणु सहायक है,क्योंकि इंद्रिय, मन,और विचार की पुष्टि नौ कर्म के माध्यम से ही होती है,मुनि श्री ने कहा कि भावों के बल पर नौ कर्म आते है,लेकिन जब हम शुद्धात्मा की गहराई में उतरते है,तो हमारी भाव धारा अशुभ से शुभ की ओर प्रवृत्त हो जाती है, जब हम धर्म के रास्ते पर चल पड़ते है, तो पाप का रास्ता अपने आप बंद हो जाता है। “भावनायोग” कोई कल्पना नहीं है यदि यह आपकी साधना का अंग बन गया तो आपके जीवन में व्यापक बदलाव आ जाएगा।
मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 9 अगस्त को पूर्णिमा के अवसर पर प्रातः7 बजे से 55 मिनट की वृहद शांतिधारा एवं”रक्षाबंधन महापर्व” के महत्व पर मुनि श्री की देशना सुनने का लाभ सभी को मिलेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


