मां ने दीक्षा ली तो ग्रहस्थ के पुत्र और पुत्र वधु माता पिता बने उनकी पुत्री ने पूर्व में ही आर्यिका दीक्षा ले रखी थी और उन्होंने ही केशलोंच कियाl

धर्म

मां ने दीक्षा ली तो ग्रहस्थ के पुत्र और पुत्र वधु माता पिता बने उनकी पुत्री ने पूर्व में ही आर्यिका दीक्षा ले रखी थी और उन्होंने ही केशलोंच किया
इडरगढ़

इडरगढ़ पर्वत की बड़ी ही ऐतिहासिक व पावन अतिशय युक्त धरा पर परम पूज्य चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 सुनील सागर जी महाराज के कर कमलो के द्वारा टाकाटुका ग्राम निवासी श्री अमृतलाल शाह की धर्मपत्नी कांता बहन का दीक्षा उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास से पंच जैनेश्वरी दीक्षा के साथ सम्पन्न हुआ। वृहद व विशाल आयोजन में गृहस्थ के बड़े पुत्र सुधीर शाह और उनकी धर्मपत्नी को अपनी माँ के माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ क्योकि कांता बहिन के दूसरे जन्म का प्रारम्भ हो रहा था।

 

 

इस अवसर पर पूर्व में ही आर्यिका बन चुकी उनकी पुत्री रूपल(आर्यिका विन्रम मति) केशलोंच कर रही थी। दृश्य बड़ा ही अनुपम और मनोहारी था जिसे देखकर वैराग्य का भक्ति भाव जनमानस के हृदय में हिंडोले मार रहा था।

 

वर्तमान युग में दीक्षा धारण करना बड़ा ही दुर्लभतम कार्य है यदि संसार में सात अजूबे हैं तो उसमें सबसे अलग और उनसे भी दुर्लभ अजूबा जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर संयम के पथ पर आरूढ़ होना है।

 

भावुकता से नहीं अपितु अंतरात्मा से इतना बड़ा निर्णय लिया जाता है। साधना करना और उस संयम साधना के पथ में आगे बढ़ना कहने को तो सरल हो सकता है।

 

परंतु उसके उलट बिल्कुल ही कठिन कार्य है यथा तलवार की धार पर चलने के समान है। अनुमोदना
संजय जैन बड़जात्या कामां 

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