सम्मेद शिखर तीर्थ की वंदना हेतु कड़कडाती ठंड में भी रात 2:00 बजे श्रद्धालु कर रहे हैं तीर्थ की वंदना
पारसनाथ
प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सम्मेद शिखर इस तीर्थ स्थल पर बीस तीर्थंकरों ने मोक्ष को प्राप्त किया है एवं यह तीर्थ एक शाश्वत भूमि है। कहा जाता है कि एक बार बंदे जो कोई ताही नरक पशु गति नहीं होई l
तीर्थ का आलम यह रहता है कि इस तीर्थ की वंदना करने के लिए कैसा भी मौसम हो यात्री श्रद्धा आस्था के साथ सर्दी गर्मी बरसात की परवाह नहीं करते हुए वंदना करते हैं। इस समय भीषण सर्दी जिसमें व्यक्ति गर्म कपड़ों को पहनने के बाद भी कप कपाता है ऐसी भीषण सर्दी में भी श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं है और वंदना करने हेतु पर्वत पर पहुंच रहे हैं।

6 डिग्री के तापमान में करीब रात्रि 2:00 बजे से ही यात्री पर्वत की वंदना करने हेतु धर्मशालाओं से निकलकर वंदना हेतु चल पड़ते हैं। रात्रि के 2:00 बजे शीतलहर की एवं ठंड की अधिकता रहती है लेकिन यात्री इसकी परवाह नहीं करते हुए अपने आप को गर्म कपड़ों में लपेटकर प्रभु पार्श्वनाथ के दर्शन की आस लिए बढ़ चलते है। घना कोहरा होने के बावजूद भी पारसनाथ भगवान की जय जयकार करते हुए बस वंदना की और वंदना की बढ़ते जाते हैं। जो अपने आप में यह बताता है की आस्था और श्रद्धा के आगे मोसम भी उनकी भक्ति को देखकर नतमस्तक हो जाता है।

पर्वत की 27 किलोमीटर की वंदना में 9 किलोमीटर चलना 9 किलोमीटर के दर्शन और 9 किलोमीटर उतरना इस तरह से यह वंदना होती है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर युवा बुजुर्ग भी इसमें पीछे नहीं रहते। जैसे ही वंदना करते हुए यात्री अंतिम टोक पारसनाथ भगवान की स्वर्णभद्र कूट पर पहुंचते हैं तो जय जयकार करते हैं और अपनी सारी थकान को भूल जाते हैं।
प्रसिद्ध गीतकार रविंद्र जैन ने लिखा है कि पारस रे तेरी कठिन डगरिया
मोक्ष जहां से गया तो जिनराई
उस पर्वत की कठिन चढ़ाई
पारस रे तेरी कठिन डगरिया।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
