धर्म कोई वस्तु नहीं वरन वस्तु का स्वभाव है। मुनि श्री
दमोह
पूज्य मुनि श्री अजित सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन मे धर्म क्या है यह बताया बताते हुए उन्होंने कहा धर्म ही होता है जो मनुष्य को दुःख से निकालकर सुख के सिहासन पर बिठाता है उन्होने आगे कहा दया का भाव ही धर्म है व अहिंसा ही परमोधर्म है नन्हे मन्दिर की धर्म सभा मे उन्होने आगे कहा धर्म कोई वस्तु नहीं वरन वस्तु का स्वभाव है।
उन्होने उदाहरण देते हुए कहा राक्षस यदि धर्मात्मा के वेश मे आ जाए तो वो खतरनाक बन जाता है रावण का उदाहरण देते हुए बताया की रावण धर्मात्मा के वेश मे आकर किस तरह सीता का हरण कर ले जाता है लेकिन वह कभी सीता को अपना बना नहीं पाया मुनि श्री प्रकाश डालते हुए कहा गलत मन से किया गया धर्म कार्य कभी भी फलदायी नहीं हो सकता यदि किसी का मन ही गंदा हो तो वह गंगा मे डुबा रहा तो कोई फर्क नहीं पड़ता है ठीक उसी तरह गंगा मे डूबे रहने वाले मगरमच्छ कभी पवित्र नहीं हो सकते उन्होने जोर देते हुए कहा मन की निर्मलता जरूरी है तभी जाकर गंगा का जल हमे निर्मल कर पाता है आप मंदिर मे बैठे रहे तो मन कभी पवित्र नहीं होगा धर्म को धारण करते है तभी मन पवित्र होता है धर्म बाह्य वस्तु का नहीं अपितु अन्दर के परिणामो की विशुद्धि का नाम है जिनालय मे पार्श्वनाथ विधान मे मुनि श्री ने यह भाव व्यक्त किये
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
