देखना, सुनना, बोलना धर्म है परंतु रागद्वेष करना अधर्म है योग सागर महाराज

धर्म

देखना, सुनना, बोलना धर्म है परंतु रागद्वेष करना अधर्म है योग सागर महाराज
रहली
धन की शोभा दान से है,सरोवर की शोभा कमल से है और जीव मनुष्य की शोभा धर्म से है । सभी धर्म में एक ही बात कही गई है बताने और समझने का तरीका अलग है। कितना भी पढ़ो कितना भी सुनो जब तक मनन नहीं होगा उसमें विवेक का इस्तेमाल नहीं होगा तब तक उपलब्धि हासिल नहीं हो सकती।

 

यह बात जैन धर्मशाला में धर्मसभा के को संबोधित करते हुए ज्येष्ठ निर्यापक मुनिश्री 108योगसागर महाराज ने कही।मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य वैभवशाली होते हुए भी पर पदार्थ पाने को भी भिखारी की तरह दर-दर भटक रहा है, हम विभाव में भटकते हैं, जबकि हमें धर्म की स्वरूप स्वभाव को समझना और प्राप्त करना है, देखना-सुनना-बोलना धर्म है, परंतु राग द्वेष करना अधर्म है, इच्छाएं ही हमसे पाप कराती है, इच्छाओं का दमन करना ही शांति है। दीक्षा का मतलब है संकल्पित होना हम सभीसंकल्पित हैं, जिनका विवाह हो गयाउन्होंने शादी के समय सात वचनों से संकल्प लिया था। हम साधु सप्त

व्यसन, इच्छाओं से दूर हैं इसलिए साधुओं को राग द्वेष नहीं होता और एक मनुष्य है कि चक्रवर्ती की संपदामिलने पर भी उसकी मन संतुष्ट होने वाला नहीं है।क्या करना है- क्या खोकर आए क्या पाना है इस सबके लिए स्वयं के समझना जरूरी है, स्वयं को जान लिया तो इच्छाएं समाप्त हो जाएगी इच्छाएं स्वयं की नहीं पर पदार्थ की होती है वहीं दुखदाई है। जैसे अपनजेब से पैसा निकालना चोरी नहीं है लेकिन दूसरे की जेब से पैसे निकालना चोरी होती है।किसी ने पूछा मंदिर और मकान में क्या अंतर है, एक ही सामग्री से बनते हैं, पर उसे भीतर की बात समझ नहीं आती बंधुओ घर में ममता है और ममता मे राग द्वेष है मंदिर में समता है जो संतुष्ट करती है और सुख देती है। मंदिर की मूर्ति है वह बोलती नहीं, देखती नहीं सुनती नहीं तो मंदिर जाने का क्याफायदा। पर यह सोचो घर में रहने केकितने नुकसान हैं, इसका मूल्यांकनमैं कौन हूं संसार में क्यों आया- नहीं करता।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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