आत्मा का सुख उसी को मिलता है जो प्रयत्नशील रहते हैं नियम सागर महाराज

धर्म

आत्मा का सुख उसी को मिलता है जो प्रयत्नशील रहते हैं नियम सागर महाराज
विदिशा
“आत्मा का सुख उसी को मिलता है,जो प्रयत्नशील रहते है, जिसको प्यास लगी है वह कुए के पास जाता है कुआ प्यासे के पास नहींं जाता।

 

उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री108 नियमसागर जी महाराज ने शीतलधाम में व्यक्त किये मुनि श्री ने कहा कि आप सभी लोग भव्य है,जो संसार सुख को गौण मानकर भीतर के सुख पाने को तरस रहे है,वह अभव्य कैसे? वह तो भव्य ही है जो सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र रुपी आत्म गुणों को प्राप्त करा कर परमार्थ के सुख को दिला देगा। उन्होंने पंचपरमेष्ठी की व्याख्या करते हुये कहा कि अरिहंत और सिद्धपरमेष्टी पद बाहर से नहीं सोपे जाते आचार्य उपाध्याय और निर्यापक श्रमण बाहर के पद है जो परम बीतरागी होते है वह बाहर के पदों से दूर रहते है।

 

 

 

निर्यापक साधु पढ़ाने के साथ साथ साधुओं के गुणों को सम्हालने के लिये प्रायश्चित भी देते है।आचार्य परमेष्टि भगवान की वाणी को जनजन तक पहुंचाने का कार्य करते है।
“योग्यता तो भीतर से ही आती है,बाहर से तो पद दिया जाता है यदि भीतर से व्यक्ती योग्य नहीं है,तो उसे पद नहीं दिया जाना चाहिये ।

 

 

उन्होंने कहा कि जो लोग मंदिरों में अथवा सामाजिक पदों को पाने के लिये झगड़ा करते है उनको तो पद नहीं दिया जाना चाहिये यह तो विशुद्ध राजनीति है,यदि अनुचित को ही उचित मानकर पद पर चढ़ा दिया जाता है तो वह अनर्थ ही अनर्थ करते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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