अन्तर्मना उवाच*
पुरूषार्थ करने से पौरुष्य नहीं जाता,
*धर्म करने से अधर्म नहीं ठहरता..*
*मौन रहने से कलह नहीं होती,*
*जीओ और जीने दो को अपनाने से परमात्मा नहीं रूठता..!*
*भगवान महावीर स्वामी* अवसर्पणी काल के अन्तिम तीर्थंकर थे और *तीर्थंकर ऋषभदेव* पहले।
विश्व के प्रथम गणराज्य वैशाली के राजा सिद्धार्थ और मां त्रिशला के पुत्र वर्धमान, *जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर के रूप में पूजनीय, वन्दनीय हुए*।




कुण्ड ग्राम के समृद्ध परिवेश में *आपका जन्म ईशा से 599 वर्ष पूर्व हुआ था*।
अपने विशिष्ट गुणों के कारण *आपके पांच नाम — वर्धमान, वीर, अतिवीर, सन्मति और महावीर विश्व में प्रसिद्ध हुये*।
30 वर्ष की अल्प आयु में गृह त्याग कर, सन्यास को धारण कर, बन गये *पूर्ण दिगम्बर वीतरागी – जिनकी दिशाएं ही वस्त्र बन गई*।
भगवान महावीर स्वामी का व्यक्तित्व निषेधों का व्यक्तित्व नहीं, बल्कि *स्वीकृतियों और सकारात्मक सोच का अखण्ड ज्योति पुन्ज बन गया*।
भगवान महावीर स्वामी ने प्रेरणा दी – *सच्चाई को जानने की और भीतर के सत्य को प्रगट करने की*।
भगवान महावीर स्वामी ने कहा – *मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से जाना पहचाना जाता है*।
भगवान महावीर स्वामी ने कहा – *धर्म अन्धो की रैली नहीं, आंख वालों की यात्रा का नाम है*।
भगवान महावीर स्वामी ने कहा – *वस्तु का स्वभाव धर्म, क्षमा, सन्तोष, दया, प्रेम, सदभाव, मैत्री को धारण करने से आत्म कल्याण सम्भव है*।
भगवान महावीर स्वामी ने आज से 2550 वर्ष पूर्व कहा था – *धर्म ऐसा अस्तित्व नहीं जो मनुष्य – मनुष्य के बीच दरार पैदा करे, धर्म – धर्मात्माओं के बीच खाई पैदा करे, बल्कि यह एक ऐसी नैतिक, धार्मिक, व्यवहारिक, दार्शनिक व्यवस्था है जो ना सिर्फ मनुष्य से मनुष्य के बीच अपितु सम्पूर्ण प्राणीमात्र के प्रति दया – करूणा – प्रेम का सेतू निर्मित करती है*।
भगवान महावीर स्वामी ने – *हिंसा को पाप और अहिंसा को धर्म स्वीकार किया, असत्य को गलत और सत्य-शील को भगवान बनने का मार्ग बताया*।
भगवान महावीर स्वामी ने – *अनेकांत, स्याद्वाद के माध्यम से दूसरों के विचारों को सहिष्णुता पूर्वक सम्मान देने का मार्ग बताया*।
भगवान महावीर स्वामी ने – *अन्याय को मिटाया और न्याय की स्थापना करके उसे मजबूत किया* क्योंकि धर्म वह ज्योति है, जो बिन भेदभाव के अन्धकार को मिटाकर, प्रकाश की राह बताती है।
भगवान महावीर स्वामी ने सूत्र दिया – *जीओ और जीने दो* – वस्तुतः जो जीना चाहता है वह ही अपने अड़ोस-पड़ोस-नगर मुहल्ले-देश-दुनिया के लिए सह अस्तित्व की रचनात्मक स्थितियों की संरचना कर सकता है।
जीओ और जीने दो का शब्द परस्पर में एक दूसरे के पूरक हैं, और एक दूसरे के बिना आधे और अधूरे भी, इसलिए *स्वयं पर विजय प्राप्त करने के लिये भगवान महावीर स्वामी ने जीओ और जीने दो के सूत्र को मुखर किया*।
भगवान महावीर स्वामी का आत्म धर्म – *जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था, सभी आत्मा एक सी है और दुनिया की सभी जीवात्मा भगवान बन सकती है*, इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार और व्यवहार रखें, जो हमें स्वयं को पसंद हो…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
