आचार्य श्री शांति सागर महाराज की देव शास्त्र गुरु के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री शांति सागर महाराज के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु और शास्त्र ज्ञान देते हैं लेकिन आप में ग्रहण करने की सामर्थ है तो, किसी भी स्रोत से ज्ञान ले सकते हैं।
ऐसी क्षमता वाला ग्राहक पत्थर को भी भगवान मानकर धर्म प्रेरणा ले सकता है, जिसमें यह क्षमता नहीं है उसके लिए प्रतिमाएं भी कुछ नहीं कर सकती। आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि प्रथम आचार्य आचार्य श्री शांति सागर महाराज ने नाम के अनुरूप दर्शन ज्ञान के अवलंबन से चरित्र का जीवन में प्रयोग किया। उनकी देव शास्त्र गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा थी।।






आस्था साधना में और विश्वास हृदय में था। लक्ष्य में सफलता के सूत्र भी यही है। जन्म भी सभी का होता है मृत्यु भी आती है। जीवन जैसा जिया है चाहे अच्छे काम किए हो, या बुरे काम किए हो। उनके परिणाम हमें शुभ और अशुभ कर्म के उदय से प्राप्त होते हैं। और उसी अनुरूप कर्म का बंध होता है। कर्म के उदय आने पर पुण्य या पाप का फल मिलता है।
चारित्र चक्रवर्ती ज्ञान वारिधि प्रतियोगिता के विषय में कहा कि इत्र प्रतियोगिता में पुरस्कार या पदक कोई भी जीते है। लेकिन जो पुरुषार्थ ज्ञान के लिए किया है, उसमें सम्मान मिलेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
