रस ही कहाँ रहा रिश्तों में..!प्रसन्न सागर जी महाराज
उदगाव
भारत गौरव साधना महोदधि सिंहनिष्कड़ित व्रत कर्ता अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहाँ की रस ही कहाँ रहा रिश्तों में..!
मैं देख रहा हूं – सिंगल आदमी भी दुखी है, रिश्ते वाले भी दुखी है, शादी सुदा भी दुखी है, भाई बहन भी दुखी है, बाप बेटे भी दुखी है, तो फिर ज़िन्दगी के मजे आखिर कौन ले रहा है-?

रिश्तों में कितनी भी मधुरता क्यों ना हो, यदि अनुराग और अपनत्व का भाव या अपनेपन की डोर ढ़ीली पड़ रही है तो सम्बन्धों में नीरसता आने लगती है। जीवन बोझिल लगने लगता है। फिर एक छत के नीचे रहने का कोई औचित्य भी नहीं है। बस दिन कट रहे हैं और जीवन का निर्वाह हो रहा है, क्योंकि रिश्तों में आत्मीयता का अभाव जो आ गया है। ज्वाइंट फैमिली में पहले जो प्रेम, अपनापन और अनुराग का भाव दिखता था, वो आज के रिश्तों में खत्म सा हो गया है। रस ही कहाँ रहा रिश्तों में..!
नरेंद्र जैन पियूष जैन अभिषेक जैन ने बताया की महाराज श्री ने कहा एक घरेलू जीवन में अनुराग और अपनत्व का भाव बहुत जरूरी है जिससे घर परिवार में आत्मीयता बनी रहे। सभी रिश्तों में ये जरूरी है, फिर वो घर परिवार के रिश्ते हो या संघ समाज के सम्बन्ध हो। रिश्तों की सफलताओं के लिये तीन सूत्र पर्याप्त है
सोचो मत – शुरुआत करो अनुराग से अपनत्व की।
वादा मत करो – करके दिखाओ निस्वार्थ भाव से।
बोलो मत- साबित करो,, प्रेम अनुराग को…!!!
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
