मोक्ष मार्ग का द्वार खुलने जैसा है गुरु का सानिध्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज 

धर्म

मोक्ष मार्ग का द्वार खुलने जैसा है गुरु का सानिध्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
डोंगरगढ़
आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जब हवा सामने से आती है तूफान के रूप में तो बड़े से बड़े वाहन चालक को भी हिला देती है और उसे वहीं रुकना पड़ता है। पैदल चलने वाला भी दो कदम पीछे हो जाता है। तब होने भगवान की याद आती है।

 

 

 

 

उन्होंने कहा अच्छा समय जल्दी निकल जाता है और बुरा समय बहुत बड़ा कालखंड लगता है। यहां तीन की महत्ता ज्यादा है देव ,शास्त्र, गुरु प्रत्यक्ष देव के दर्शन आज दुर्लभ है इसीलिए हमें स्थापित देव से ही काम चलाना है। छात्र जो भगवान के समूह चरण में गंदर प्रविष्टि ओंकार ध्वनि को सुनकर उसको खोलकर हम देते हैं जो आज भरपूर मात्रा में हमारे पास उपलब्ध है जिसका स्वाध्याय कर ज्ञानार्जन किया जा सकता है। गुरु का सानिध्य मिल जाना मतलब मोह को आधार खोलने जैसा है। हमारी तो यही भावना है कि जब भी हम गुरुजी के पास जाएंगे तो उनसे पूछेंगे कि आपने हमको याद किया कि नहीं। वो अवश्य इन 16 सालों में ही होंगे। और वहां आचार्य कुंदकुंद देव, आचार्य समंतभद्राचार्य, आचार्य ज्ञानसागर महाराज सभी से मिलना होगा।

 

 

 

पूज्यश्री ने भगवान महावीर स्वामी के समवशरण के विषय में बोलते हुए कहा कि जब भगवान महावीर स्वामी का समय शरण लगा था तो सभी करोड़ों देवी देवता मौजूद थे, लेकिन भगवान की दिव्य ध्वनि नहीं खिरी। जब गणधर परमेष्ठी इंद्र भूति वहां पहुंचे उन्होंने भगवान से माफी मांगी कि मैं थोड़ा विलंब से आया। तत्पश्चात भगवान महावीर स्वामी की दिव्य ध्वनि
खिरी। जो उनके सर्वांग से ओमकार ध्वनि गुंजायमान हो रही थी, तुम वहां उपस्थित गदर स्वामी उस ध्वनि को सुनकर उसे खोलते जाते हैं और इस प्रकार हमें पुराण ग्रंथों और शास्त्रों के माध्यम से तीर्थंकर भगवान की देशना प्राप्त होती है। गुरु जी हमें पीछे से हवा की तरह आगे बढ़ने को साहिब करते हैं।

 

 

अच्छे कार्य है हमेशा समय पर उपस्थित रहते हैं
पूज्यश्री ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि कुंडलपुर के बड़े बाबा जब नए मंदिर में विराजमान हुए थे तो उस समय हम को भी वह दृश्य देखने को मिला था कि वह 16 वर्ष का सरदार बालक जैसे ही संकल्प पूर्वक आजीवन मांसाहार और मदिरा का त्यागकर गेयर लगाता है, तो बड़े बाबा फूल की तरह उठकर नहीं मंदिर में विराजमान हो जाते हैं और वहां एक बाल का भी अंतर नहीं आता है। अच्छे कार्य हमेशा समय पर ही उपस्थित रहते हैं। आमी यदि हर दिन भगवान की आराधना करते हैं तो प्रतिकूल या विपरीत परिस्थिति आती है तो उस समय हमें कोई विकल्प नहीं होता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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