मन में क्या है यह वचन से बॉडी लैंग्वेज से प्रकट होता है कनकनंदी गुरुदेव
सागवाड़ा
योगेंद्र गिरी पर विराजमान कलिकाल समंतभद्र आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जिस प्रकार निर्मल शीतल जल से शरीर निर्मल हो जाता है वैसे निर्मल शीतल वाणी से सत्य निर्मल हो जाता है।
मन में क्या है यह वचन से बॉडी लैंग्वेज से अवश्य प्रकट होता है। तुम शांत हो पवित्र हो यह तुम्हारा रोम-रोम बताता है। शरीर के हर अंग होठ, भौहे ,आंखें सब चिल्ला चिल्ला कर मनोभाव को प्रकट करते हैं। एक उदाहरण से बताया की मनोवैज्ञानिक फ्रायड अपनी पत्नी बच्चे सहित घूमने के लिए जाते हैं वहां बच्चा खो जाता है तो वह कहते हैं तुमने बच्चे को जहां जाने के लिए मना कहा होगा वही बच्चा होगा और वैसे ही होता है। शरीर में फौरन तत्व धुली मिट्टी जो खराब तत्व होता है उसे शरीर स्वीकार नहीं करता अतः छींक आती है। मन में जो है उसे रोक नहीं सकते। मन को संयमित केंद्रित नियंत्रित करने से सभी इंद्रियां संयमित हो जाती है।
मन चंचल अधोगामी होता है अतः मन को अपना दास बनाने पर शांति प्राप्त होती है। केवल पढ़ने के लिए नहीं हर समय मन को एकाग्र करना चाहिए, जिससे स्मरण शक्ति तथा विभिन्न रोग दूर होते हैं। परस्पर में प्रेम सौहार्द के लिए मन नियंत्रण के लिए सत्य निष्ठ समता से युक्त होना चाहिए। सूर्य प्रकाश चंद्र प्रकाश बाह्य प्रकाश परम प्रकाश नहीं है उससे आत्मज्ञान नहीं होता है। सुज्ञान का प्रकाश सर्वश्रेष्ठ है। परम परम ज्योति करोड़ों सूर्य चंद्र से भी अधिक सुज्ञान प्रकाश होता है। लौकिक प्रकाश से मोह रूपी अंधकार दूर नहीं हो सकता यह मन रूपी मदमस्त हाथी लौकिक पढ़ाई के निर्मल अंकुश से वश मे नहीं किया जा सकता अतः यह जीव को कुमार्ग में ले जाता है। मन अस्थिर होने पर स्वादिष्ट भोजन भी रुचिकर नहीं लगता धर्म भी रुचिकर नहीं लगता मन को नियंत्रित करने के लिए ही धर्म है। उत्तम बुद्धि के धारण करने वाले भव्य जीव जिनवाणी रूपी अंकुश से मन रुपी मदमस्त हाथी को नियंत्रित करते हैं। सत्य की ज्योति आत्मज्योति परम ज्योति है। जिसकी बुद्धि पवित्र है संकीर्णताओ से परे है, विद्यार्थी है, गुणग्राही है। वह सत्य को प्राप्त कर सकते हैं।
महाराज श्री ने कहा सत्य तुम स्वयं हो जिस प्रकार आंख स्वयं को नहीं देख सकती वैसे ही हम स्वयं को नहीं देख सकते। बुद्धि बढ़ाने के लिए आनंद प्राप्त करने के लिए विशुद्ध बुद्धि है। ब्रह्मांड में समस्त सार का सार सत्य परम उत्तम है। विज्ञान सत्य को जानने की सीरीज है। असत्य को दूर करने के लिए अहिंसा अपरिग्रह आदि है।
मुंबई से पंकज जैन की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि पंचम काल में सम्यक दर्शन लेकर जन्म नहीं होता परंतु पंचम काल में भी 8 वर्ष अंतर मुहूर्त बाद सम्यक दृष्टि बन सकते है। चतुर्थ काल में भी सभी सम्यक दृष्टि जन्म नहीं लेते थे। मुंबई से डॉक्टर रीता की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि सत्य को प्राप्त करने के लिए सत्य स्वरूप बनने के लिए अहिंसा साधन है सत्य साध्य है। जीव असत्य आदि विभावों को दूर करने के लिए अहिंसा का पालन करते हैं। सत्य में सभी धर्म समाहित है।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता मन रे तू काहे उछल कूद करें, तू तो मम कृतदास रे मंगलाचरण किया ।
इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी माताजी सुवत्सलमती क्षुल्लिका भक्ति श्री माताजी, अमेरिका से योगेंद्र भैया हैदराबाद से अनुराग भैया नागपुर से तृप्ति मुंबई से पंडित कीर्ति
सम्मेद शिखरजी से मनीष जैन नंदौर ने आचार्य संभव सागर जी गुरुदेव का दर्शन स्वास्थ्य लाभ हेतु दर्शन कराया आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अपने गुरु को नमोस्तु तथा स्वास्थ्य लाभ की कामना की आदि अनेक लोगों ने वेबीनार का लाभ लिया
विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
