अन्याय से कमाया हुआ धन स्वयं को भी नष्ट कर देता है तथा धर्म को भी भ्रष्ट कर देता है। आचार्य कनकनदी
भीलूड़ा
शांतिनाथ मंदिर में विराजित ज्ञान विज्ञान दिवाकर आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कहा कि बड़े-बड़े नेता बड़े बड़े व्यापारी सफेदपोश चोर है। न्यायोचित दंड विधान सबको पालन करना आवश्यक है। अन्याय से कमाया हुआ धन स्वयं को भी नष्ट कर देता है तथा धर्म को भी भ्रष्ट कर देता है।
आचार्य श्री ने कहा भ्रष्टाचार, मिलावट, पंच पाप करने वाला, परिग्रह करने वाला समस्त पाप, समस्त कषाय करता है।
अन्याय से कमाया हुआ धन स्वयं को भी नष्ट कर देता है तथा धर्म को भी भ्रष्ट कर देता है। उन्होनें कहा अन्याय से उपार्जित धन दान में देना भी नहीं चाहिए, तथा दान में लेना भी नहीं चाहिए। यह धर्म का भी नाश कर देता है। अन्याय से धन कमा कर चतुर्थ काल में भी आहार दान पाप हैं। न्याय से धन कमा कर केवल पानी केवल एक ग्रास आहार देना भी पुण्य है। चोरी का माल मोरी में जाता है यह कहावत सही है।
आचार्य श्री ने कहा अपने शिष्यो, भक्तों को दोष करने पर भी नहीं डाटेंगे तो वह स्वयं दंड के भागी बन जाएंगे। न्याय से दंड देना पाप नहीं है, दंड नहीं देना पाप है। न्यायोचित दंड देना चाहिए। उन्होनें समझाया जिस प्रकार रोग के निदान के लिए ऑपरेशन किया जाता है। अन्याय का पक्ष मन, वचन, काया से लेना भी पाप है। दंड के बिना धर्म की, न्याय की स्थापना नहीं हो सकती। न्याय से दंड मिले या ना मिले परंतु स्वयं के कर्म का फल स्वयं को भोगना ही पड़ता है। पंच पापों से, कषायो से आत्मा स्वयं दुखी होता है। विषय वासना रूपी खुजली से खुजालकर स्वयं दुखी होते हैं। कोई भी पाप करने वालों को मानसिक, शारीरिक दुख संक्लेश, चल नहीं पाना, बोल नहीं पाना, सुन नहीं पाना, रोगी होना अवश्य होते हैं। पापी को दंड मिलना गलत मानना भी पाप है। अन्याय के लिए अधिक धन देना पड़ता है। एक में अनंत कार्य कारण संबंध होते हैं। आचार्य श्री ने कहा पाप करके स्वयं को दुखी मत करो, स्वयं की हत्या मत करो, स्वयं की चोरी मत करो, स्वयं का बलात्कार मत करो जिससे आत्मा पतीत हो, दुखी हो, अशांत हो, संक्लेषित हो, ऐसे कार्य मत करो। मिथ्या, रूढी, स्वार्थ को छोड़कर विकास नहीं करने वाला दंड का भागी है। मिलावट करना रुपया लेकर रोग बेचना है। पाप का धन धर्म में लगाने का निषेध है। आध्यात्मिक दृष्टि से पतीत का उद्धार भगवान भी नहीं कर सकते चाहे तुम राजनीतिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से, परिवार की दृष्टि से श्रेष्ठ भी हो।
महात्मा गांधी के विषय मे कहा
उन्होनें महात्मा गांधी के विषय मे कहा की उन्होंने कहा की लक्ष्य ही पवित्र नहीं, साध्य और साधन भी पवित्र होने चाहिए। आचार्य श्री के आचार्य शिष्य विद्यानंद जी ने कहा कि आचार्य श्री शास्त्र के आलोक में समाज को देखते हैं। शास्त्र समाज से बनता है। पुण्य पाप का अनुभव समाज में होता है। चारों कषायो के अंत में लोभ को रखा है, पांचों पाप के अंत में परिग्रह को तथा रोद्र ध्यान में अंत में परिग्रहानंदी रखा है क्योंकि यह अधिक पाप है वह बहुत पुरुषार्थ करने पर निकलता है। नरक गति में जाने का कारण भी अधिक आरंभ और अधिक परिग्रह है। आरंभ परिग्रह को सीमित करने वाला देशव्रती 16 स्वर्ग तक जा सकता है।
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
