भाव बचाने के हो और हिंसा हो ‎ ‎ जाए तो वह पाप का दोष नहीं‎ लगता। यह जैन धर्म की महानता‎ है दुर्लभ सागर महाराज

धर्म

भाव बचाने के हो और हिंसा हो ‎ ‎ जाए तो वह पाप का दोष नहीं‎ लगता। यह जैन धर्म की महानता‎ है दुर्लभ सागर महाराज

आष्टा

पूज्य मुनि श्री दुर्लभसागर महाराज  मुनि‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ ‎ संघ का आष्टा नगर में सोमवार की‎ प्रातः  मंगल बेला मे भोपाल नाका से नगर‎ आगमन हुआ। मुनिश्री ससंघ ने सांईं कॉलोनी स्थित नवीन‎ नेमिनाथ जिन मंदिर के दर्शन किये । उसके उपरान्त  मुनिससंघ को   किला‎ मंदिर लाया । जो धर्म सभा मे परिवर्तित हुयी इस मंगल बेला मे  आचार्यश्री‎ की मांगलिक पूजन की गयी

वही इस बेला मे दिव्य देशना देते हुए मुनि श्री सन्धान सागर महाराज ने  भावो की विशुद्धि पर बल दिया उन्होने कहा की जितनी भाव विशुद्धि बढेगी ‎ उतनी ही शुद्धि हमारे चेतन तत्व में‎ बढ़ेगी। और साधु समता परिणामों से‎ युक्त होते हैं। इस बेला मे मुनि श्री दुर्लभ सागर महाराज ने अपनी दिव्य देशना मे जैनधर्म को भाव प्रधान बताया उन्होने कहा की जैन धर्म भावों पर आधारित होता‎ है। इस पर विशेष प्रकाश डाला कहा यदि  भाव बचाने का  हो और यदि  हिंसा हो ‎ ‎ जाए तो वह पाप का दोष नहीं‎ लगता। यही जैन धर्म की महानता‎ है।सब भावों के परिणामों पर ‎ ‎ आधारित है। उन्होने यह भी कहा  भावों के द्वारा यदि  हिंसा‎ होती है तो वह महान दोष का‎ कारण होती है। उन्होने इस पर राजा श्रेणिक का उदाहरण दिया बताया की राजा श्रेणिक ने भी ‎ ‎ सातवें नरक की आयु को क्षण भर‎ में अपने परिणामों से क्षीण करके‎ अपना भव सुधार किया था। साथ ही कहा जैसा ‎ हम भाव करेंगे वैसा ही परिणाम‎ सामने वाले के होते हैं।‎

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

 

 

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