*अन्तर्मना उवाच* (21 मई!)बाहर से सुलझा हुआ दिखने के लिये..*अन्दर से बहुत उलझना पड़ता है..!*
*अन्तर्मना उवाच* (21 मई!)बाहर से सुलझा हुआ दिखने के लिये..*अन्दर से बहुत उलझना पड़ता है..!* *बाहर से सुलझा हुआ दिखने के लिये..* *अन्दर से बहुत उलझना पड़ता है..!* *आदमी भी कैसा अदभुत प्राणी है?* वह जीते जी कभी शांत नहीं होता, वह कसम खा कर बैठा है, जब तक जिऊंगा, अशांत ही जिऊंगा। […]
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