अन्तर्मना उवाच* (13 मई!) जो समर्पण से मिल सकता है, वो अकड़ने से कभी नहीं मिल सकता..*
*अन्तर्मना उवाच* (13 मई!) जो समर्पण से मिल सकता है, वो अकड़ने से कभी नहीं मिल सकता..* *जो समर्पण से मिल सकता है, वो अकड़ने से कभी नहीं मिल सकता..* *बड़ो के सामने बड़े बनोगे तो विरोध होगा, और* *यदि छोटे बन जाओगे तो सब कुछ मिल जायेगा..!* प्रभु की छाँव […]
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