धर्म से डिगते व्यक्ति को पुनः धर्म में स्थिर करना ही ‘स्थितिकरण’ : मुनि श्री योगसागर महाराज

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धर्म से डिगते व्यक्ति को पुनः धर्म में स्थिर करना ही ‘स्थितिकरण’ : मुनि श्री योगसागर महाराज

‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के श्लोक 16 में स्थितिकरण अंग का मार्मिक विवेचन — सहधर्मी के प्रति वात्सल्य, करुणा और सद्भावना रखने का दिया संदेश

कोटा, 11 अगस्त।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में चल रही चातुर्मास प्रवचनमाला में मंगलवार को धर्म और आत्मकल्याण का गहन संदेश दिया गया। आचार्य समन्तभद्र स्वामी रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के श्लोक क्रमांक 16 की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने सम्यग्दर्शन के ‘स्थितिकरण अंग’ का मार्मिक एवं व्यावहारिक विवेचन किया।

 

मुनिश्री ने कहा कि धर्म से डिगते हुए व्यक्ति को पुनः धर्म में स्थिर करना ही स्थितिकरण है। जीवन में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता और उतार-चढ़ाव आते-जाते रहते हैं, लेकिन इन परिस्थितियों के कारण धर्म, सत्य और आत्मकल्याण के मार्ग से विचलित होना उचित नहीं है।

विपरीत परिस्थितियों में धर्म से विमुख नहीं, दृढ़ रहने की आवश्यकता

मुनि श्री योगसागर महाराज ने कहा कि यदि कोई सम्यग्दृष्टि जीव किसी कारणवश धर्ममार्ग से विचलित होने लगे, तो उसे उपेक्षित करना अथवा उसकी आलोचना करना धर्म का स्वरूप नहीं है। ऐसे समय में उसके प्रति प्रेम, वात्सल्य, करुणा और आत्मीयता का भाव रखते हुए उसे पुनः धर्ममार्ग पर स्थिर करना ही सच्चे श्रावक का दायित्व है।

 

 

उन्होंने कहा कि धर्म केवल स्वयं नियम, संयम और साधना का पालन करने तक सीमित नहीं है। किसी सहधर्मी को धर्म में संभालना, उसकी आस्था को मजबूत करना और आवश्यकता पड़ने पर उसे पुनः धर्ममार्ग पर स्थापित करना भी धर्म की महत्वपूर्ण साधना है।

 

कटुता नहीं, वात्सल्य और सद्भावना से संभालें सहधर्मी को

मुनिश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति के जीवन में कठिनाई आए, वह निराश हो जाए अथवा उसकी धर्म के प्रति आस्था कमजोर पड़ने लगे, तो ऐसे समय में उसे कटु शब्दों, आलोचना और दोषारोपण की नहीं, बल्कि सहारे, सद्भावना और आत्मीयता की आवश्यकता होती है।

उन्होंने श्रावकों को प्रेरित करते हुए कहा कि समाज में धर्म की स्थिरता केवल व्यक्तिगत साधना से नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग, वात्सल्य, करुणा और धर्मानुराग से भी मजबूत होती है। विपरीत परिस्थितियों में किसी सहधर्मी को अकेला छोड़ने के बजाय उसके मनोबल को बढ़ाना और उसे धर्म की मूल भावना से पुनः जोड़ना ही स्थितिकरण अंग की वास्तविक साधना है।

 

 

स्वयं धर्म में दृढ़ रहें और दूसरों को भी संभालें

मुनि श्री ने आह्वान किया कि प्रत्येक श्रावक को स्वयं धर्म में दृढ़ रहना चाहिए और अपने संपर्क में आने वाले ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, जो किसी कारणवश धर्ममार्ग से विचलित हो रहा हो। स्वयं धर्म में स्थिर रहना और दूसरों को भी धर्म में स्थिर करना—यही स्थितिकरण अंग की सार्थकता है।

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🌺 धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

चातुर्मास प्रवचनमाला के अंतर्गत बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुनिश्री की देशना का लाभ लेने के लिए नसियां जी पहुंचे। श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। मुनिश्री की अमृतमयी वाणी से पूरा मंदिर परिसर धर्म, भक्ति और आत्मचिंतन के भावों से ओतप्रोत रहा।

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🙏 आज के प्रमुख पुण्यार्जक

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री मुकेश जी, श्री सचिन जी, श्री बंधन जी एवं श्री स्वप्निल जी जैन, मुजफ्फरनगर, तथा ब्रह्मचारिणी ममता दीदी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की मंगलभावना हेतु श्री वेद ज्ञानचंद जी, श्रीमती रूपा जी, श्री आशीष जी एवं समस्त देवरिया परिवार, केकड़ी, तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया।

 

 

 

श्री अशोक खादी ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन खंडेलवाल सरावगी समाज, दादाबाड़ी, कोटा तथा श्री मुकेश जी, श्री सचिन जी, श्री स्वपनिल जी, श्रीमती प्राची जी, श्रीमती उषा जी जैन, मुजफ्फरनगर एवं श्री सुरेन्द्र जी, श्रीमती गुणमाला जी, श्री दीपक जी, श्रीमती अंकिता जी एवं अविका सहित सिद्धम हरसोरा परिवार, कोटा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री महावीर जी, श्रीमती भारती जी, श्रीमती नेहा जी एवं श्री सिद्धार्थ जी मित्तल परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

 

 

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी के आहारदान का सौभाग्य अर्चना जी एवं मंजू दीदी परिवार को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती दमयन्ती हरसोरा द्वारा सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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🌼 गुरुवाणी का अमृत संदेश

“धर्म से डिगते हुए व्यक्ति को पुनः धर्म में स्थिर करना ही स्थितिकरण है; स्वयं धर्म में दृढ़ रहें और दूसरों को भी धर्ममार्ग पर स्थिर करने का प्रयास करें।”

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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