_आत्मोद्धार शतक….. आचार्य श्री आर्जवसागर_(धर्म के घात से पापार्जन )
जिसके मन में धर्म रहा हो, मृत्यु का भी स्वागत हो।
क्षमा-भाव रख सहनशीलता, दया शांति का धारक हो ॥
धर्म-भाव गर गया मनस् से, पिता पुत्र न रक्षक हों।
पुत्र पिता की, पिता पुत्र की, कर हिंसा, वे भक्षक हों।
(हिंसादि पापों से महापाप का अर्जन)
अक्ष-सुखों का भोग मात्र न, हिंसादिक जो पाप करे।
पापास्रव से बंध पाप का, होता वह अभिशाप रहे ॥
मात्र भोज्य वह अजीर्ण ना हो, गर मात्रा प्रतिकूल रहे।
असमय में भी अशन करे तो, अपच आदि का मूल रहे
(धर्म न करने का फल)
हिंसादिक प्रत्यक्ष रूप से, दुख के कारण कहलाते।
अतिशयकारी उभय-लोक में, दुःख दें, लगते सुख लाते ॥
लोक-सुखी उन धीमानों ने, जिसका पालन सदा किया।
पर-भव में भी परोपकारी, क्यों नहिं तुमने धर्म किया
(पुण्य-कार्य ही सर्वोत्तम)
हिंसक-प्राणी निरपराधि उन, मृग आदिक का हनन करे।
अन्य जन्तु-घातक वह प्राणी, उभय-लोक-दुख वहन करे ॥
निंदा, दैन्य व मान, चौर्य तज, झूठ आदि परिहार करो।
यश, सुख, धर्म-प्रयोजन कारक, पुण्य-कार्य स्वीकार करो।
(उपसर्गों में भी धर्मी की रक्षा)
पुण्य-कर्म को करो निरन्तर, पुण्यवान रक्षित होता।
बड़े-बड़े उपसर्ग-उपद्रव, आयें तो ना च्युत होता ॥
पार्श्वनाथ को हुए उपद्रव, विभूति-बढ़ने में कारण।
यथा सूर्य वह कमलों को जहँ, विकसित होने में साधन॥
(सत्पुरुषों का पुरुषार्थ )
रावण का पुरुषार्थ व्यर्थ था, जहाँ पुण्य का योग नहीं।
जहाँ धर्म हो पुण्य वहीं हो, पुण्य रहे तो विजय वहीं ॥
राम रहे थे पुण्यवान वे, न्याय-नीति का साथ लिया।
जंगल में भी धर्म-निष्ठ थे, मुनियों को आहार दिया ।
