सरलता ही आध्यात्मिक उत्कर्ष का मूल — आचार्य कनक नदी गुरुदेव
/भिलुडा।
भिलुडा के समीप स्थित शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने कहा कि “सरल बनना सबसे कठिन साधना है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे सरल रेखा खींचना कठिन है, परंतु उसे खींच लेने पर वक्र रेखा स्वतः समझ में आ जाती है, उसी प्रकार जीवन में सरलता आत्मबोध का द्वार खोलती है।
आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि भूमि स्वयं धान्य नहीं है, पर धान्य की उत्पत्ति का कारण है। उसी प्रकार पूजा, अभिषेक और पुण्य धर्म नहीं हैं, बल्कि धर्म के साधन हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान आत्मा का स्वभाव है और भाव-शुद्धि के बिना कोई भी बाह्य क्रिया सार्थक नहीं हो सकती।
“मैं कीचड़ में उत्पन्न होकर भी पंकज की तरह निर्लिप्त हूं”
अपने उद्बोधन में आचार्य श्री ने कहा कि साधक को संसार में रहते हुए भी कमल की भांति निर्लिप्त रहना चाहिए। अभिषेक और पूजा में द्रव्य की शुद्धि के साथ-साथ भाव की शुद्धि अनिवार्य है। पूजा-अभिषेक भाव-विशुद्धि का अवलंबन है।

उन्होंने समझाया कि जैसे बहुत सारे ग्रंथ होने पर भी बिना पढ़े ज्ञान नहीं होता, भोजन होने पर भी बिना ग्रहण किए भूख नहीं मिटती, वैसे ही पूजा का वास्तविक फल तभी मिलता है जब साधक उसे आत्मसात करे। आत्मा का निरंतर ध्यान ही आत्म-पूजा है, यही आत्म-पूजा उपनिषद का सार है।


प्रतीकों का आध्यात्मिक अर्थ
आचार्य श्री ने पूजा की प्रत्येक सामग्री के आध्यात्मिक प्रतीक समझाते हुए कहा—
जल (उदक) आत्म-विशुद्धि एवं जन्म-जरा-मृत्यु नाश का प्रतीक है।
चंदन शीतलता का द्योतक है, जो संक्लेश को नष्ट करता है।
अक्षत (चावल) संसार उत्पादक कर्मों के विनाश की भावना से अर्पित किया जाता है।
पुष्प (सुमन) उत्तम और निर्मल मन की भावना का प्रतीक है।
नैवेद्य मोह एवं वेदनीय कर्मों के क्षय की भावना से अर्पित किया जाता है।
दीप अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करता है।
धूप आठों कर्मों के क्षय का प्रतीक है।
फल ज्ञानानंद से परिपूर्ण जीवन का संकेत देता है।
अर्घ मोक्षपद की प्राप्ति की भावना से अर्पित किया जाता है।
उन्होंने कहा कि भगवान की जयमाला उनके गुणों का गुणानुवाद है और पूजा का उद्देश्य उन गुणों को आत्मसात करना है।
मोक्ष के साधन और साध्य


आचार्य श्री ने बताया कि उत्तम संहनन के बिना न ध्यान संभव है, न केवलज्ञान और न ही मोक्ष। शरीर साधन है, साध्य नहीं। मोक्ष प्राप्ति के पश्चात शरीर कपूर की भांति विलीन हो जाता है।
कार्यक्रम में मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता की पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं—
“पायो जी मैंने परम आत्मज्ञान पायो,
जिसके बिना अनंत काल में अनंत परिवर्तन कीयो।”
वेबीनार में देश-विदेश से जुड़े श्रद्धालुओं ने धर्म, आत्म-ध्यान और भाव-शुद्धि के संदेश को आत्मसात किया।
जानकारी स्रोत: विजयलक्ष्मी जैन
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 9929747312
