कर्म के अधीन जीने वाला व्यक्ति कभी बड़ा आदमी नहीं हो सकता सुधासागर महाराज
आगरा
महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर, डी ब्लॉक, कमला नगर आगरा मे पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री सुधासागर महाराज सानिध्य जिन प्रतिमाओं का स्वर्ण कलशों से महामस्तकाभिषेक किया गया एवम आदिनाथ भगवान का महाशान्तिधारा महामहोत्सव मनाया गया l
उसके बाद धर्मसभा हुई धर्मसभा का प्रारम्भ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीपप्रज्जवलन से हुआ।

धर्मसभा में निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज जी अपने प्रवचन में कहा कि तुम तीर्थ नही बन पाओगे लेकिन इन पैरों से तीर्थ वंदना कर लोगे तो ये पैर धर्म के हो जायेगे l

उन्होंने कहा जो हमारे वर्तमान को कुंठित करती है उसे बोलते है किस्मत, या कर्म। कर्म के अधीन जीने वाला व्यक्ति कभी भी बड़ा आदमी नहीं हो सकता, वह बड़ा दिख सकता है, बड़ा हो नहीं सकता। बड़ा दिखने वाला और बड़ा होना दोनो अलग चीज है। किस्मत का जो खाते हैं, समझ लेना वो एक दिन बहुत दुखी होगे,




उन्होंने कहा किस्मत का खाने वाले को रहीश, अय्याश बोलते है, उनमें देवता है, जो पूर्वभव का खाते है। किस्मत का जो खाते है वो बासा खा रहा है और बासा खाने वाला व्यक्ति कभी पूज्य हो ही नही सकता। इसलिए जब तुम्हारी जिंदगी में लगे है कि मेरी किस्मत बहुत अच्छी है समझ लेना तुम संसार के सबसे निकृष्ट, छोटे और कमजोर आदमी हो क्योंकि तुम्हारी जिंदगी में नया कुछ भी नही है। बाप-दादो की कितनी ही अच्छी किस्मत लेकर आना वो ज्यादा देर नही चलती।

जब भी तुम कमाई करते हो और तुम्हें ये भाव आता है- मैं अच्छा कमाने वाला हूँ, गुडलक हूँ, बन्धुओ भविष्य अच्छा नहीं है तुम्हारा, तुम धन दौलत के मालिक नहीं हो, रखवाले हो। सबसे बड़ा मलिक वह कहलाता है जो कमाने के बाद खर्च पर विचार करता है। जहाँ-जहाँ तुम्हारी किस्मत का हाथ हो वहाँ-वहाँ तुम्हें भगवान की कोई जरूरत नहीं है, भगवान किस्मत वालो का साथ नही देते। गार्जियन की जरूरत वहाँ है जहाँ कमाना कर्म से है और गंवाना धर्म से है। जब हम धर्म का उपयोग नही कर पाते है तो वह सारा धर्म, कर्म रूप में परिणित हो जाता है और जैसे ही धर्म, कर्म में परिणित होता है तो ये पूज्य पद खत्म हो जाता है।
उन्होंने कहा मनुष्य का शरीर सात कुधातुओ से भरा हुआ पिंड है, पसीना, बाल टूटना सब होता है इनसे सहित होने के बाद भी वह आहार देने के लिए पात्र है जबकि देवताओं का शरीर शुद्ध होने के बाद भी इतना अशुद्ध कहा कि यदि महाराज को चौके में पता चल जाये कि यहाँ देवता है तो वे अंतराय कर देंगे क्योंकि उनके आहार का समय नियत नही। जो किस्मत को हमेशा लकी मानकर के रहता है और हमेशा कमाने के रूप में लगा रहता है अंततक ऐसे व्यक्ति मरकर के धौ का पेड़ होते है। सारे पेड़ों की जगह पानी की तरफ जाती है लेकिन धौ के पेड़ की जड़ वहाँ जाएगी जहाँ धन रखा है। जब भी कमाई होगी कर्म से होगी, धर्म कभी कमाई नही कराता। तुम कमाने के बाद जो खर्च करोगे वो धर्म और धर्मात्मा से पूछकर करोगे, पूज्य पुरूषों से पूछकर करोगे, पूज्य कौन- घर की दृष्टि से माँ-बाप, परमार्थ की दृष्टि से गुरु भगवान और जिनवाणी माँ।
सम्यकदृष्टि भोजन बना लेगा, ये कर्म का बनाया भोजन है, सम्यकदृष्टि कहता है मैं नही खाऊँगा, मैं कर्म की नही, धर्म की कमाई खाता हूँ।
ये भोजन, धन, दौलत कर्म की कमाई है, मैं धर्म की कमाई खाऊँगा लो भगवान ने कहा नही खायेगा तो भूखों मरेगा, तो भगवन कर्म की कमाई कैसे खाऊँ, कर्म की कमाई जो खाता है उसकी दुर्गति होती है। ओहो क्या जिनेंद्र देव का धर्म है, उन्होंने कहा- बेटा! खाने के पहले उसमे से थोड़ा दान धर्मात्मा को दे देना तो वो धर्म की कमाई है, कर्म की नही। आँखे कर्म से मिली है, धर्म मे परिवर्तित करो, भगवन! मैं आँखे नही खोलूँगा क्योंकि आँखे कर्म से मिली है कर्म पतन कराएगा। तो सुबह से उठकर इन आँखों से धर्म करा लें भगवान का दर्शन कर आ, फिर ये आँखे धर्म की हो गयी। जिनवाणी ने कहा इसे प्रवचन सुनाओ क्यों क्योंकि इसके जो कर्म के कान है वे धर्म के हो जायेगे। ये मुख कर्म से मिला है, सुबह एक भगवान की पूजा कर ले ये मुख धर्म का हो जाएगा। ये हाथ तुझे कर्म से मिले है भगवान के चरण छू ले, ये हाथ धर्म के हो जायेगे। तुम तीर्थ नही बन पाओगे लेकिन इन पैरों से तीर्थ वंदना कर लोगे तो ये पैर धर्म के हो जायेगे। धर्मसभा
का संचालन मनोज जैन बाकलीवाल ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
