अन्तरंग, बहिरंग, परिग्रह से मुक्त होकर जीने के अभ्यासी थे तपस्वी सम्राट सन्मति सागर महाराज प्रसन्न सागर महाराज
अन्तरंग, बहिरंग, परिग्रह से मुक्त होकर जीने के अभ्यासी थे तपस्वी सम्राट सन्मति सागर महाराज प्रसन्न सागर महाराज अच्छे लगते हैं गुरू जन तब,, जब वो हमारे बीच से गुजर जाते हैं..! इसलिए सन्त बनकर नहीं, साधक बनकर रहो। सन्त एक दिन बिदा हो जाते हैं, लेकिन साधक हमारे दिल में बस जाते हैं। […]
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