भारतीय संस्कृतिअन्न को बचाने की संस्कृति है, लेकिन युवा पीढ़ी इस अन्य के अपमान को अपना स्टैंडर्ड मान रही है। मुनि श्री भावसागर महाराज
घाटोल
पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री विमल सागर महाराज ने संघ सहित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के दर्शन करते हुए दिवाली के उपरांत होने वाले पंचकल्याणक महा महोत्सव के कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण किया।
जिनालय की मूलनायक प्रतिमा वासपूज्य भगवान की है यह प्रतिमा लगभग 725 वर्षीय प्राचीन है। इस अतिशयकारी एवं अलौकिक प्रतिमा को नए रजत गर्भ ग्रह में विराजमान किया जाएगा। इस पंचकल्याणक महोत्सव में श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में बन रहे मान स्तंभ की भी प्रतिष्ठा होगी। इस मान स्तंभ में हॉट प्रतिमाओं को विराजमान किया जाएगा।

मिली जानकारी अनुसार नगर में होने जा रहे पंचकल्याणक को लेकर के काफी उत्साह देखा जा रहा है। पंचकल्याणक महोत्सव किस तारीख को होगा इसकी घोषणा दीपावली के उपरांत की जाएगी। लेकिन तैयारी को अंतिम रूप दिया जाने लगा है।

इन मांगलिक पलों में पूज्य मुनि श्री भावसागर महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा की हमारे भारत देश की संस्कृति अन्न बचाने की प्रेरणा देती है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी इस अन्न के अपमान को अपना स्टैंडर्ड मान चुकी है। भोजन को जूठ में छोड़ना उन्हें स्टैंडर्ड का प्रतीत होता है। एक रोचक जानकारी देते हुए पूज्य मुनि श्री ने कहा कि जिस देश में 37% लोग गरीबों की रेखा के नीचे जीते हैं। जिनकी भोजन की व्यवस्था भी निश्चित नहीं, ऐसे में जूठन छोड़ना पाप ही समझा जा सकता है। जूठन को मानसिक विकृति बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि हमारे अंदर थाली को धोकर पीने की विचारधारा होनी चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार न्यूटन छोड़ना अनुचित बताया गया है।

अपने मार्मिक एवं करुणामई वचनों से पूज्य मुनि श्री ने कड़ा प्रश्न चिन्ह खड़े करते हुए कहा कि आज रोजाना हजारों लोग बगैर रोटी खाए सो जाते हैं, और हम अपनी थाली में भोजन को जूठा छोड़ देते हैं। भोजन उतना ही लेना चाहिए जितना हम खा सके। इसके द्वारा बचा हुआ भोजन किसी दूसरे के काम आ सके। एक संदेश देते हुए कहा कि इतना लो थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में। पैसे से अन्न खरीद नहीं जा सकता। अन्न तो धरती अपनी छाती चीर कर देती है। यदि कोई उसका अपमान करता है तो धरती दुखी होती है। और दूसरे जन्म में उसे अन्य के लिए दर्शाती है।
उन्होंने एक संकल्प दिलाया कि आज से हम संकल्प लेने की हम थाली में कभी जूठन नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने इस महा पाप बताते हुए कहा कि यह महा पाप है फिर भी बहुत लोग इसे जूठा छोड़ते हैं। हम आजकल अन्य पैसे से खरीदते हैं, और इसकी तुलना पैसे से करते हैं। जूठन छोड़ देते हैं और उसे फेंक देते हैं। लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। उन्होंने खिलाने वाले को भी संकल्प दिलाया कि खिलौने वाले भी यह संकल्प लेने की हम उतना ही भरोसेचेंगे जितना आवश्यक होगा, जबरदस्ती खाने से शरीर को नुकसान होता है।

पूज्य मुनि श्री विमल सागर महाराज ने भी अपने उद्बोधन में कहा कि भगवान की स्तुति के प्रभाव से सब कुछ प्राप्त हो जाता है, भोजन में भले ही कमी आ जाए लेकिन भजन में कमी नहीं आना चाहिए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
